अक्षय ऊर्जा की संभावनाएं

  • December 28, 2019

उत्तर प्रदेश दूसरे राज्यों की तुलना में भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है। उत्तर प्रदेश अक्षय ऊर्जा को बढ़ाने के लिए जो भी कदम बढ़ाएगा वह न केवल, इस प्रदेश के लिए, बल्कि पूरे भारत के लिए मायने रखेगा।

आइपीसीसी यानी इंटरनेशनल पैनल इन क्लाइमेट चेंज की हालिया रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि समय हमारे हाथों से निकल रहा है। हम ग्लोबल वार्मिग को दो डिग्री सेंटीग्रेड तक कम करने के आस-पास भी नहीं हैं, जबकि वैज्ञानिकों के अनुसार हमें ग्लोबल वार्मिग को 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड तक सीमित रखने की आवश्यकता है। अगर अगले कुछ दशकों में पूरी तरह से जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता कम नहीं हुई तो मानव सभ्यता को बचाना मुश्किल होगा। कुछ दूरदर्शी समाज और उनके नेता ऐसे भी हैं जो इस गंभीर चुनौती को पहचान रहे हैं और दृढ़ संकल्प के साथ इस पर काम कर रहे हैं। अमेरिका द्वारा पेरिस समझौते से हटने के राष्ट्रपति ट्रंप के फैसले के बावजूद, अमेरिका में कैलिफोर्निया राज्य ने एक कानून बनाया है कि वर्ष 2045 तक राज्य में बिजली उत्पादन गैर-जीवाश्म ईंधन स्नोतों से होनी चाहिए। जर्मनी में एक तिहाई से अधिक बिजली की खपत अब अक्षय ऊर्जा स्नोतों से होती है और 2030 तक इसे 65 प्रतिशत करने की योजना है।

उत्तर प्रदेश सौर ऊर्जा के लिए बोलियां आमंत्रित करने में आगे रहा है और इसमें बाजार से प्रतिक्रिया भी सकारात्मक रही है। इसकी योजनाएं महत्वाकांक्षी हैं और सफल होनी भी चाहिए। सवाल यह है कि क्या यूपी अधिक महत्वाकांक्षी अक्षय ऊर्जा के उपयोग में देश के दूसरे राज्यों की तुलना में अग्रणी भूमिका अदा कर सकता है। सौर ऊर्जा से थर्मल पावर प्लांट के मुकाबले बिजली जेनरेट करना सस्ता है।

उत्तर प्रदेश ग्रामीण क्षेत्रों में एक मेगावॉट से कम के छोटे सौर ऊर्जा संयंत्रों को बढ़ावा देकर अग्रणी भूमिका निभा सकता है। राज्य में 97,000 से अधिक गांव हैं। यदि प्रत्येक गांव में एक से डेढ़ मेगावॉट सौर ऊर्जा की क्षमता के प्लांट स्थापित किए जाते हैं तो सौर ऊर्जा की एक लाख मेगावॉट से अधिक क्षमता की संभावना हम तलाश सकते हैं। इस क्षमता को पाने के लिए निजी निवेशकों का साथ जरूरी है। इसे हासिल करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा के लिए फीड इन टैरिफ प्रणाली को अपनाना होगा। गांव स्तर के छोटे प्लांट के लिए प्रतियोगी नीलामी व्यावहारिक नहीं होगी। इसका मतलब ये है कि राज्य बिजली आयोग से स्वीकृत सरकारी वितरण कंपनियों को ये घोषणा करने की जरूरत है कि अगले दो या तीन साल के लिए वो आकर्षक दामों पर ‘पहले आओ पहले पाओ’ के आधार पर सोलर ऊर्जा खरीदेंगी। अगर कीमत तय हो जैसे 4.50 रुपये प्रति यूनिट तो ग्रिड को सोलर ऊर्जा की आपूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए ये बेहतर होगा। अगर तकनीकी नुकसान सहित ट्रांसमिशन की लागत भी शामिल कर ली जाए तो ग्रामीण सबस्टेशन पर 4.50 रुपये प्रति यूनिट, पारंपरिक स्नोतों से बिजली की लागत की तुलना में काफी कम है। इसलिए वितरण कंपनियां विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा खरीदकर आर्थिक रूप से बेहतर होंगी। प्रति यूनिट में सब्सिडी के लिए राज्य सरकार पर किए जाने वाले दावों में भी कमी आएगी।

इस दिशा में आगे बढ़ने पर यह अभियान वैश्विक मोर्चे पर अपनी जगह बना सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में निजी निवेश का यह स्तर समृद्धि के साथ साथ रोजगार के अवसर भी पैदा करेगा। कृषि आय को दोगुना करने के लक्ष्य में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान होगा। जैसा कि उत्तर प्रदेश के सभी घरों को बिजली प्रदान करने के ऐतिहासिक लक्ष्य को प्राप्त करने की राह पर है, यह इससे जुड़े सभी नए घरों को विश्वसनीय और गुणवत्तापूर्ण आपूर्ति प्रदान करने की दिशा में एक लंबा रास्ता तय करेगा। किसानों को दिन के समय बिजली दी जा सकती थी। यह उनकी दक्षता और भलाई के लिए होगा। इससे खेती के कार्यो में आसानी होगी।

उत्तर प्रदेश में देश के दूसरे हिस्सों की तुलना में मवेशी ज्यादा हैं। सभी घरों के पूर्ण विद्युतीकरण और उज्‍जवला कार्यक्रम के तहत ग्रामीण परिवारों को एलपीजी सिलेंडर और कुक स्टोव की व्यवस्था में तेजी के साथ, महिलाओं के लिए गाय के गोबर के उपले और ईंधन की लकड़ी का उपयोग करना जरूरी नहीं होगा। निजी निवेश को ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे सयंत्र स्थापित करने के लिए आकर्षित करना होगा। प्रारंभ में दर उच्च हो सकती है, लेकिन बड़ी मात्र में जेनरेशन के बाद लागत में कमी आ सकती है जैसे सौर पैनल और एलईडी बल्बों के मामले में देखा गया है।

ऐसे छोटे संयंत्रों के लिए प्रौद्योगिकी को पहले प्रदर्शित करने की आवश्यकता होती है, यह एक अच्छा विचार हो सकता है कि सहायता एजेंसियों और पीएसयू जैसे एनटीपीसी द्वारा समर्थित सीएसआर और एनजीओ के जरिये प्रयोगात्मक पायलट परियोजनाओं के रूप में ये प्लांट्स स्थापित किए जाएं। इससे हमें पता चलेगा कि यह प्रौद्योगिकी काम कर रही है और इससे यथार्थवादी लागत तय की जा सकती है।

उत्तर प्रदेश अपने गांवों में एक लाख मेगावॉट से अधिक सौर ऊर्जा प्राप्त कर सकता है। यह अपने ग्रामीण क्षेत्रों में उन सभी अपशिष्ट बायोमास का उपयोग बिजली पैदा करने के लिए कर सकता है जिसका उपयोग मनुष्यों के लिए भोजन के रूप में, मवेशियों और अन्य पशुधन के लिए नहीं किया जाता। इसके साथ, यह न केवल भारत में, बल्कि विश्व में अक्षय ऊर्जा में पैदा करने में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।

वैसे तो देश के एक बड़े इलाके में सौर ऊर्जा के तौर पर अक्षय ऊर्जा के उत्पादन की व्यापक संभावनाएं हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में यह कई मायनों में कुछ अधिक ही है

अजय शंकर

पूर्व डीआइपीपी सचिव, भारत सरकार व प्रतिष्ठित फेलो, टेरी

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