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More from Front Page

  • कैलाश मानसरोवर यात्र हुई आसान, चीन सीमा तक सड़क तैयार
  • दिव्यांगों कार्मिकों को दफ्तर आने से राहत
  • कोविड-19 से मुकाबले के लिए दो दवाओं के ट्रायल को मंजूरी
  • व्यावसायिक यात्री वाहनों को परमिट में छूट
  • फीचर फोन वाले कोरोना मरीज भी नहीं दे पाएंगे सरकार को चकमा
  • कोरोना से रिकवरी रेट तीस प्रतिशत तक पहुंचा
  • ट्रेन से कटकर मप्र के 16 मजदूरों की मौत
  • दैनिक जागरण फिर बना देश का नं. 1 अखबार
  • प्रवासी श्रमिकों को दो-दो हजार रुपये की आर्थिक मदद
  • वेबसाइट पर पढ़े
  • गढ़वाल संस्करण मूल्य ै 6.00पृष्ठ 12

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  • फीस के लिए दबाव बना रहे निजी स्कूल
  • मंदिर के कपाट खुलने पर नहीं हुआ धार्मिक आयोजन
  • 18 मई को खुलेंगे रुद्रनाथ धाम के कपाट
  • किसानों को उचित मुआवजा देने की मांग
  • 12 हजार 742 मीटिक टन चावल कराया उपलब्ध

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  • मनुष्य द्वारा किया गया अच्छा व्यवहार उसे ताकत देता है और दूसरों को उसी तरह से अच्छा व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है।प्लेटो
  • कुलसचिव ने कर्मचारी नेता के खिलाफ दी तहरीर
  • बार संघ अध्यक्ष ने की बार काउंसिल की सराहना
  • 10 प्रधान और 20 आशा कार्यकर्ता हुए प्रशिक्षित
  • जांच को तीन दिन बाद भी गांव नहीं पहुंची टीम
  • कहीं नियमों का पालन, कोई बना लापरवाह
  • सुतोल के ग्रामीणों ने किया गांव में 24 मई तक लॉकडाउन
  • प्रवासियों का गांव में स्वागत नहीं, हो रहा है विरोध

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  • मयकशों पर फूल बरसाकर किया शराब की दुकान का विरोध
  • डिजिटल लर्निंग कवायद को प्राथमिकता मिलना जरूरी
  • आरोपितों की पहचान को लेकर जांच शुरू
  • 77 वर्षीय गोदांबरी ने पीएम केयर्स फंड दिए एक लाख
  • विद्या मंदिर में ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया आरंभ
  • स्वास्थ्य सुविधा देने में जुटा है आरएसएस
  • नायब तहसीलदार निभा रहे कोरोना योद्धा की भूमिका
  • गुरुवार को आए तूफान से टिहरी झील में डूबी बोट
  • कोरोना योद्धा का हृदय गति रुकने से निधन
  • आंगनबाडी कार्यकत्रियों ने बांटी पोषण किट
  • स्वैच्छिक रक्तदान कर रुद्रप्रयाग व चमोली की डीएम ने पेश की मिसाल
  • इबादत व ड्यूटी का फर्ज निभा रही खाकी
  • सीएम राहत कोष में दिए 40 हजार

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  • लीसा से भी संवरेगी आर्थिकी
  • जीएमओयू ने उठाई टैक्स माफ करने की मांग
  • एसएसपी को भेजा ज्ञापन
  • शारीरिक दूरी के नियमों की उड़ रही धज्जियां
  • आधार पेमेंट सिस्टम से जुड़ डिजिटल लेन-देन आसान
  • पुरोला में टूट रहे हैं शारीरिक दूरी के नियम। इस तरह से उमड़ रही है भीड़ ’ जागरण
  • मरीज के साथ तीमारदार को रखना होगा गेट पास
  • काष्ठ कला को संजोने में जुटे अरविंद
  • मंदिर भूमि कब्जाने के खिलाफ ग्रामीणों में आक्रोश
  • पंजीकरण की तिथि आगे बढ़ाने की मांग

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  • उपेक्षा का दुष्परिणाममहाराष्ट्र के औरंगाबाद में पैदल अपने घर जाने को निकले मजदूरों की मालगाड़ी से कुचल कर मौत मन-मस्तिष्क को झकझोर देने वाला हादसा है। यह हादसा केवल इसलिए नहीं हुआ कि थके-हारे मजदूरों ने रेल पटरियों पर सोने की गलती की, बल्कि इसलिए भी हुआ कि कोई यह देखने-सुनने वाला नहीं था कि आखिर वे पैदल सफर करने को क्यों मजबूर हुए? किसी को उन्हें पैदल जाते देखकर रोकना चाहिए था, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। यह संभव नहीं कि महाराष्ट्र के शासन-प्रशासन के लोगों ने इन अभागे मजदूरों को पैदल जाते देखा न हो। साधनहीन मजदूरों की दीन दशा देखकर भी उनकी अनदेखी करना संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। उन कारणों की तह तक जाने की जरूरत है जिनके चलते श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाए जाने की घोषणा के बाद भी मजदूर पैदल ही अपने गांव-घर के लिए निकल ले रहे हैं। समस्या केवल यह नहीं है कि महाराष्ट्र के विभिन्न शहरों में रह रहे मजदूर ही पैदल अपने गावों के लिए कूच कर रहे हैं, बल्कि यह भी है कि अन्य राज्यों में रह रहे कामगार भी ऐसा करने को मजबूर हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि मजदूरों को उनके गांव पहुंचाने की जो व्यवस्था की गई है उसमें कोई खोट है? आखिर क्या कारण है कि आए दिन ऐसे समाचार आ रहे हैं कि प्रमुख औद्योगिक शहरों में रह रहे मजदूर अपने गांव जाने की मांग को लेकर सड़कों पर निकल आ रहे हैं? इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि कुछ राज्य बाहरी मजदूरों से रुकने का आग्रह कर रहे हैं। उन्हें यह समझना होगा कि इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि उनके खाने-रहने की उचित व्यवस्था की जाए। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि अनेक स्थानों पर यह व्यवस्था संतोषजनक नहीं। यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि जिन भी राज्यों से मजदूर पैदल अपने गांव जाने के लिए निकल ले रहे हैं उन्हें जवाबदेह बनाया जाए। आखिर जब देश के कई हिस्सों से ऐसे समाचार आ रहे हैं कि मजदूर कोई साधन-सवारी न मिलने पर पैदल ही रास्ता नाप रहे हैं तब फिर संबंधित राज्य सरकारों को अपने जिला प्रशासन को ऐसे आदेश-निर्देश जारी करने में क्या कठिनाई है कि वे जहां भी पैदल जाते दिखें उन्हें रोककर उचित तरीके से उनके शहर भिजवाने की व्यवस्था की जाए? यह सही है कि अनिश्चित भविष्य को देखते हुए मजदूर अपने गांव-घर जाने को लेकर बेचैन हो रहे हैं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस बेचैनी की एक वजह उनकी उपेक्षा भी है। यह उपेक्षा यही बताती है कि राज्य सरकारें अपने वायदे पर खरी नहीं उतर पा रही हैं।
  • आर्थिक मोर्चे पर चुनौतीकोरोना संक्रमण के बीच लॉकडाउन के कारण आर्थिक गतिविधियां ठप होने से सरकार के सम्मुख बड़ा संकट खड़ा हो गया है। हालात इस कदर गंभीर हैं कि सरकार को वेतन देने के लिए बाजार से कर्ज लेना पड़ रहा है। ऐसे में सरकार ने शराब और पेट्रोल-डीजल पर हेल्थ केयर टैक्स लगाकर राजस्व की भरपाई करने का प्रयास किया है। यह उचित फैसला है। सरकार को राजस्व जुटाने के और भी तरीके तलाशने होंगे। मसलन तंबाकू उत्पादों को भी इस दायरे में रखा जा सकता है। इसके अलावा कैबिनेट बैठक में औद्योगिक विकास को गति देने के भी प्रयास किए गए हैं, लेकिन उद्योगों के सामने तमाम तरह की चुनौतियां हैं। मसलन प्रदेश से बड़ी संख्या में श्रमिक अपने गांवों को लौट चुके हैं। ऐसे में उद्योगों के लिए उत्पादन शुरू करना आसान नहीं है। गुरुवार को पुरोला से 42 श्रमिक पैदल ही बिहार के चंपारण के लिए रवाना हो गए थे। यह अलग बात है कि पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और वापस पुरोला के राहत कैंप में भेज दिया। यह तो एक बानगी भर है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कोरोना काल में मुसीबतों का अंबार है, लेकिन यह समय एक अवसर भी है। सरकार भी इसे समझ रही है। करीब 60 हजार लोग विभिन्न राज्यों से उत्तराखंड स्थित अपने गांवों में लौट आए हैं। मजबूरी ही सही, लेकिन खाली हो रहे पहाड़ के गांवों के लिए यह एक अच्छा संकेत है। रिवर्स पलायन पर जोर दे रही सरकार अब इन लोगों को रोकने का प्रयास कर रही है। पलायन आयोग को उम्मीद है तीस फीसद लोग यहीं रोजगार की संभावना तलाशेंगे। ऐसे में सरकार भी इन लोगों के पुनर्वास के लिए संजीदा हुई है और इनके लिए स्वरोजगार की संभावनाएं खोजी जा रही हैं। यही वजह है कि कैबिनेट ने फैसला लिया है कि ऐसे लोगों को ऋण मुहैया कराए जाएंगे, जिस पर अनुदान दिया जाएगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि स्वरोजगार की संभावना तलाश रहे लोगों को सिर्फ अनुदान ही नहीं, अन्य स्तर पर भी मदद की जरूरत पड़ेगी। प्रशिक्षण के साथ ही उनकी समस्याओं का त्वरित समाधान भी करना होगा। निश्चित ही इसके परिणाम मिलने में समय लगेगा, लेकिन यदि गंभीरता से काम हुआ तो इससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ेगी।
  • गिनती बढ़ती जा रही दिखे न कोई राह,देखि मौत के आंकड़े मुंह से निकले आह! मुंह से निकले आह नहीं कुछ भी कहि जाए, यह संकट का दौर हमें भगवान बचाए।रहें घरों में लोग यही है सबसे विनती,वरना मुश्किल और होयगी करना गिनती।- ओमप्रकाश तिवारी
  • जन-जागरणप्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में मनुष्य अपने को सर्वज्ञानी, सर्वश्रेष्ठ, अपराजित मानने का भ्रम पालने लगता है। जल, वायु, पृथ्वी, आकाश एवं अग्नि को भी अपने निहित स्वार्थ के लिए नहीं छोड़ता। अपनी-अपनी इच्छाओं एवं सामथ्र्य के अनुरूप प्रगति के अंतहीन अंत की ओर निरंतर अग्रसर होने की होड़ में लगा रहता है, परंतु मानव की सब कुछ पा लेने की भूख कभी-कभी किस प्रकार धराशायी होने लगती है, यह हमने आज जाना है।संसार में प्रलय आने में देर नहीं लगती। वह कोरोना के रूप में हो या विश्व युद्ध। हालांकि यह भी सच है कि आज इस वैश्विक मार को सहते हुए इंसानों ने कई सकारात्मक परिवर्तनों को भी अपना लिया है जो उनके जीवन जीने की शैली बनती जा रही है। यदि हम आगे भी इसी जीवनशैली का पालन करते रहे तो जीवन निश्चित रूप से अधिक अर्थपूर्ण होगा। यहां तक कि लॉकडाउन के नियमों का पालन करने के लिए एक नवीन जग-जागरण का उदय हुआ है। आज यह समझ में आया है कि हर समस्या का हल सरकार का उत्तरदायित्व नहीं है। कुछ समस्याओं से पार पाने के लिए एक-एक के योगदान का होना अनिवार्य है। ऐसा जन-जागरण न कभी देखा, न सुना जब संपूर्ण समाज स्वेच्छा से एक ध्येय को लेकर आगे बढ़े। कोरोना से इस जंग में हर व्यक्ति अपने आप में एक योद्धा है। सभी ने अपरिमित संयम, अनुशासन का परिचय दिया है।इतनी बड़ी आपदा ने हमें बहुत कुछ सिखाया है। कहां समय था कि हम नीले आकाश को निहारते, पास के गांव में मोर नाचता है, यह जान पाते। जन-जागरण हुआ अपनी आकांक्षाओं पर नियंत्रण पाने का, प्रदूषण के मूल कारण को पहचानने का। प्रकृति के साथ सीमा से अधिक खिलवाड़ हमारे विनाश का कारण बन सकता है। इस भयावह स्थिति से निकल सामान्य जीवन को पटरी पर लाने के लिए वर्तमान जन-जागरण की ऊर्जा व्यर्थ न जाए, यही संकल्प लिए सुंदर भविष्य की ओर अग्रसर हों।छाया श्रीवास्तव
  • शनिवार, 9 मई, 2020: ज्येष्ठ कृष्ण 2 वि. 2077
  • उज्‍जवल भविष्य की कामनाबना रहे सामूहिकता का भाव शीर्षक लेख में डॉ. विजय अग्रवाल ने कोरोना वायरस तथा उसके प्रभाव स्वरूप उपजाई जा रही नकारात्मक स्थितियों का आकलन किया है। हमें यह समझना होगा कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज का अंत, उपन्यास का अंत, लेखक की मृत्यु, इतिहास का अंत अथवा ईश्वर की मृत्यु जैसी घोषणाएं निराशा से आक्रांत पाश्चात्य जगत में ही अधिक सामने आई हैं। भारतीय चिंतन तो सृष्टि के प्रत्येक जीव में सामूहिकता की भावना मानता है। सामूहिकता केवल एक भाव अथवा आवश्यकता ही नहीं है, यह एक सकारात्मक ऊर्जा है जिसके सहारे मानवता यहां तक पहुंची है। वैदिक चिंतन से अनुप्राणित भारत के प्रत्येक नागरिक के डीएनए में ही सामूहिकता है। यह जीवन की एक संरचना मात्र नहीं है, अपितु अपने आप में जीवन ही है। ऋग्वेद का अंतिम सूक्त सामूहिकता का आह्वान करता है-‘सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनासि जानताम्।’ कोरोना संकट स्थाई नहीं है। मानवता ने ऐसे अनेक संकट देखे हैं, उन पर विजय पाई है। गिरिधर के शब्दों में कहें तो-‘बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय’ से प्रेरणा लेकर सुखद एवं उच्च्वल भविष्य की कामना करें।डॉ. वेदप्रकाश, हंसराज कॉलेज, दिल्लीपैट्रोल का दाम बढ़ाना उचित नहींलॉकडाउन के तीसरे चरण में राज्य सरकार ने शराब, डीजल और पैट्रोल के दाम बढ़ाकर लोगों को मुश्किल में डाल दिया है। हालांकि शराब के दाम बढ़ाने के पीछे सरकार का यह तर्क है कि इससे ठेकों पर खरीदारों की भीड़ कम होगी। जिससे कोरोना संक्रमण का खतरा कम होगा। लेकिन डीजल व पैट्रोल का दाम बढ़ाना कोई समझदारी नहीं है। क्योंकि लॉकडाउन में भले ही लोग एक स्थान से दूसरे स्थान कम जा रहे हैं, लेकिन बावजूद इसके खरीदारों की जेब तो ढीली होगी ही। मंत्रिमंडल ने गुरुवार को पेट्रोल, डीजल और शराब के दाम बढ़ाने को मंजूरी दे दी। प्रति लीटर पेट्रोल अब दो रुपये और डीजल एक रुपया महंगा हो गया है। वहीं देशी शराब से लेकर विदेशी शराब की प्रति बोतल में 20 रुपये से लेकर 475 रुपये तक बढ़ाए गए हैं। पेट्रोल, डीजल की कीमतें गुरुवार मध्य रात्रि और शराब की बढ़ी कीमतें शुRवार से लागू होंगी।राजेश्वर उनियाल, गणोश विहारसावधानी बरतना जरूरीघातक कोरोना वायरस के चलते दुनिया में आज खौफ का माहौल है। अभी तक ढाई लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और संRमित का आंकड़ा 38 लाख को पार कर चुका है। हालांकि राहत की बात यह है कि हमारे देश में स्थिति नियंत्रण में है। यहां लॉकडाउन का तीसरा चरण चल रहा है, जिसमें सरकार की ओर से जनता को कई गतिविधियों में छूट दी गई है। लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि हम कोरोना संRमण को लेकर बेपरवाह हो जाएं। यदि हमने सावधानी न बरती तो संRमण कहीं भी फैल सकता है चाहे वह आपका पुराना परिचित फल-सब्जी विRेता या राशन डीलर ही क्यों ना हो। उनसे पहले की ही तरह पूरी आत्मीयता से सामान खरीदें लेकिन कोरोना से बचाव के लिए सरकार की ओर से जारी गाइडलाइन का पूरी तरह पालन करना भी जरूरी है।उमेश पंत, देहरादून
  • क्या मैं अपनी तपिश और बढ़ाऊं तो राहत मिलेगी?
  • आर्थिक मुख्यधारा का हिस्सा बनें मजदूर
  • भारत को नीचा दिखाने वाला सर्वेक्षण
  • असफलता सफलता की ट्यूशन फीस है

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  • परवान नहीं चढ़ी कांजी हाउस बनाने की योजना
  • डायल आउट कांफ्रेंस से किसानों से संवाद
  • बंदिशें हटा खनन से जुटाएंगे 750 करोड़
  • तू कितनी अच्छी है ..
  • पुलिस के हाथ में लाठी नहीं, मदद की थाली
  • उत्तराखंड में भी श्रम कानूनों में छूट देगी सरकार
  • कोरोना के दो नए मामले, छह स्वस्थ
  • ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार आíथकी का बेहतर जरिया

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  • रिलायंस के जियो प्लेटफॉर्म्स में एक और बड़ा निवेश
  • पैकेज में हुई देरी तो बेरोजगारी की आएगी सुनामी
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  • जापान ने मांगी उसकी कंपनियों के संचालन में मदद
  • शेयर बाजारों को रिलायंस का दम
  • देश बड़ी बेरोजगारी के मुहाने पर खड़ा
  • राहुल गांधी का पीएम से अनुरोध, बॉस नहीं मुख्यमंत्रियों से सहयोगी व मददगार की तरह करें संवाद
  • शारीरिक दूरी के साथ जॉगिंग कर रहा रोबोट

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  • ऑस्ट्रेलिया दौरे पर क्वारंटाइन को तैयार बीसीसीआइ
  • भारतीय महिला अंडर-17 फुटबॉल टीम की फिटनेस बेहतर : कोच
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  • पंजाब में खेतों में जा गिरा मिग-29, पायलट सुरक्षित
  • एनजीटी ने एलजी पॉलीमर्स पर ठोका 50 करोड़ जुर्माना
  • ममता के लिखे गाने के आदेश को लेकर हंगामा
  • इस गांव के खून से समृद्ध एम्स का ब्लडबैंक
  • लंबित परीक्षाएं एक जुलाई से, जल्द आएगा शेड्यूल

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  • बंगाल में मृत्युदर दर सबसे अधिक
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  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा-31 अगस्त तक आए ढांचा ध्वंस मामले पर फैसला
  • अगले सप्ताह तक विदेश में फंसे 15,000 भारतीय स्वदेश लौटेंगे
  • टेस्टिंग पर जोर, पर किट पर खामोशी
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  • सामुदायिक प्रसार को रोकने को एसिम्प्टोमैटिक लोगों की होगी जांच

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  • अफगानिस्तान के स्वास्थ्य मंत्री कोरोना की चपेट में
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  • कोरोना से फैल रही नफरत की सुनामी पर यूएन ने जताई चिंता
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