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  • शराब माफिया की जड़ तक पहुंचने को खेमका के नाम की सिफारिश
  • सीबीएसई की बोर्ड परीक्षाएं एक जुलाई से
  • दैनिक जागरण फिर बना देश का नं. 1 अखबार
  • दैनिक जागरण वेबिनार में लोगों से संवाद करेंगे दुष्यंत चौटाला
  • इस गांव के खून से समृद्ध दिल्ली के एम्स का ब्लड बैंक
  • ट्रेन से कटकर मप्र के 16 मजदूरों की मौत
  • अब पूरे हरियाणा में फैला कोरोना

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  • जेई का वर्क एट होम हुआ खत्म, दिव्यांग कर्मियों को नहीं आना पड़ेगा ऑफिस
  • देशभर की जरूरत होगी पूरी
  • लॉकडाउन में जमकर बेची शराब, अब कैसे दें हिसाब
  • यूके में हरियाणवियों ने दिखाई एकजुटता की राह
  • हाई कोर्ट के दस जजों ने शुरू किया काम

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  • डेरा प्रमुख के साथी कृष्ण लाल की पैरोल की मांग खारिज
  • नाके पर तैनात पुलिस कर्मियों पर चढ़ाई कार, एएसआइ गंभीर
  • हिसार में साढ़े तीन सौ साल बाद 30 परिवार फिर हिंदू धर्म में लौटे
  • ब्लेड से पत्नी का रेत दिया गला, फिर किया आत्महत्या का प्रयास
  • फतह कीं चोटियां, अब चूल्हे पर पका रहीं रोटियां
  • पिता की अस्थियां विसर्जित करने जा रहे पुत्र समेत तीन की मौत
  • चौकी इंचार्ज व हेड कांस्टेबल सस्पेंड रिश्वत लेने का आरोप
  • सौ रेलगाड़ियों और पांच हजार बसों से घर जाएंगे कामगार
  • सोशल मीडिया पर फोटो वायरल होने से आहत युवती ने जहर निगल की खुदकशी
  • हिसार, 9 092ए0908 2020

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  • उपेक्षा का दुष्परिणाममहाराष्ट्र के औरंगाबाद में पैदल अपने घर जाने को निकले मजदूरों की मालगाड़ी से कुचल कर मौत मन-मस्तिष्क को झकझोर देने वाला हादसा है। यह हादसा केवल इसलिए नहीं हुआ कि थके-हारे मजदूरों ने रेल पटरियों पर सोने की गलती की, बल्कि इसलिए भी हुआ कि कोई यह देखने-सुनने वाला नहीं था कि आखिर वे पैदल सफर करने को क्यों मजबूर हुए? किसी को उन्हें पैदल जाते देखकर रोकना चाहिए था, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। यह संभव नहीं कि महाराष्ट्र के शासन-प्रशासन के लोगों ने इन अभागे मजदूरों को पैदल जाते देखा न हो। साधनहीन मजदूरों की दीन दशा देखकर भी उनकी अनदेखी करना संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। उन कारणों की तह तक जाने की जरूरत है जिनके चलते श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाए जाने की घोषणा के बाद भी मजदूर पैदल ही अपने गांव-घर के लिए निकल ले रहे हैं। समस्या केवल यह नहीं है कि महाराष्ट्र के विभिन्न शहरों में रह रहे मजदूर ही पैदल अपने गावों के लिए कूच कर रहे हैं, बल्कि यह भी है कि अन्य राज्यों में रह रहे कामगार भी ऐसा करने को मजबूर हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि मजदूरों को उनके गांव पहुंचाने की जो व्यवस्था की गई है उसमें कोई खोट है? आखिर क्या कारण है कि आए दिन ऐसे समाचार आ रहे हैं कि प्रमुख औद्योगिक शहरों में रह रहे मजदूर अपने गांव जाने की मांग को लेकर सड़कों पर निकल आ रहे हैं? इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि कुछ राज्य बाहरी मजदूरों से रुकने का आग्रह कर रहे हैं। उन्हें यह समझना होगा कि इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि उनके खाने-रहने की उचित व्यवस्था की जाए। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि अनेक स्थानों पर यह व्यवस्था संतोषजनक नहीं। यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि जिन भी राज्यों से मजदूर पैदल अपने गांव जाने के लिए निकल ले रहे हैं उन्हें जवाबदेह बनाया जाए। आखिर जब देश के कई हिस्सों से ऐसे समाचार आ रहे हैं कि मजदूर कोई साधन-सवारी न मिलने पर पैदल ही रास्ता नाप रहे हैं तब फिर संबंधित राज्य सरकारों को अपने जिला प्रशासन को ऐसे आदेश-निर्देश जारी करने में क्या कठिनाई है कि वे जहां भी पैदल जाते दिखें उन्हें रोककर उचित तरीके से उनके शहर भिजवाने की व्यवस्था की जाए? यह सही है कि अनिश्चित भविष्य को देखते हुए मजदूर अपने गांव-घर जाने को लेकर बेचैन हो रहे हैं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस बेचैनी की एक वजह उनकी उपेक्षा भी है। यह उपेक्षा यही बताती है कि राज्य सरकारें अपने वायदे पर खरी नहीं उतर पा रही हैं।
  • कहां गई शराबहरियाणा में शराब के ठेके खुले तो वैसी भीड़ नहीं लगी, जैसी आशंका थी। इससे लोगों को समझ में आया कि हरियाणा में लोग समझदार हो गए हैं और शारीरिक दूरी के निर्देशों का पालन करते हुए शराब खरीद रहे हैं। लेकिन भीड़ न उमड़ने का बड़ा कारण दूसरा था। वास्तव में जिन्हें शराब की आवश्यकता थी, उन्हें लॉकडाउन के दौरान भी शराब उपलब्ध रही। बस पैसे थोड़े अधिक देने पड़ते थे। लेकिन बात शराब की हो तो पैसे मायने नहीं रखते। सो, शराब के ठेकेदारों ने बचा हुआ स्टाक जमकर बेचा, जबकि 30 मार्च के बाद यह सरकार की संपत्ति हो गया था। उसे बाकायदा दर्ज करके सरकार को लौटाना था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। शराब माफिया को लगता था कि अभी तो कमाई कर लें, फिर जब हिसाब देने का समय आएगा तो लेनदेन की भारतीय परंपरा के अनुसार हिसाब-किताब दुरुस्त कर लिया जाएगा। हो भी जाता। लेकिन ठेकों पर भीड़ नहीं लगी तो सबका माथा ठनका। प्रदेश के गृह मंत्री अनिल विज को यह शिकायत भी मिली कि ठेकेदारों ने पुलिस में शराब चोरी की एफआइआर दर्ज कराने की बात सोचकर लाखों का माल बेचा है। इसके बाद विज ने दो थानेदारों को सस्पेंड कर दिया और शराब घोटाले का पर्दाफाश करने के लिए विशेष जांच दल गठित करने की सिफारिश कर दी है। विज चाहते हैं विशेष जांच दल में भारतीय प्रशासनिक सेवा के चíचत अधिकारी अशोक खेमका भी हों। स्वाभाविक है कि खेमका जांच दल में होंगे तो बहुत सारे रहस्य उद्घाटित होंगे। अपने रहस्य उद्घाटित करने की प्रकृति के कारण खेमका पहले भी सरकारों से टकराव ले चुके हैं। वैसे शराब गई कहां, इसका पता तो लगना आवश्यक ही है। क्योंकि इसे बेचकर शराब माफिया ने मोटा मुनाफा कमाया है और प्रदेश सरकार को करोड़ों के राजस्व को क्षति पहुंचाई है। उसके खिलाफ कार्रवाई होनी ही चाहिए। उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने कहा भी है कि जो ठेकेदार स्टाक का हिसाब-किताब नहीं दे पाएंगे, उनके ठेके निरस्त होंगे। लेकिन उनके ठेके निरस्त करने के साथ ही उनके खिलाफ और कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
  • गिनती बढ़ती जा रही दिखे न कोई राह,देखि मौत के आंकड़े मुंह से निकले आह! मुंह से निकले आह नहीं कुछ भी कहि जाए, यह संकट का दौर हमें भगवान बचाए।रहें घरों में लोग यही है सबसे विनती,वरना मुश्किल और होयगी करना गिनती।- ओमप्रकाश तिवारी
  • जन-जागरणप्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में मनुष्य अपने को सर्वज्ञानी, सर्वश्रेष्ठ, अपराजित मानने का भ्रम पालने लगता है। जल, वायु, पृथ्वी, आकाश एवं अग्नि को भी अपने निहित स्वार्थ के लिए नहीं छोड़ता। अपनी-अपनी इच्छाओं एवं सामथ्र्य के अनुरूप प्रगति के अंतहीन अंत की ओर निरंतर अग्रसर होने की होड़ में लगा रहता है, परंतु मानव की सब कुछ पा लेने की भूख कभी-कभी किस प्रकार धराशायी होने लगती है, यह हमने आज जाना है।संसार में प्रलय आने में देर नहीं लगती। वह कोरोना के रूप में हो या विश्व युद्ध। हालांकि यह भी सच है कि आज इस वैश्विक मार को सहते हुए इंसानों ने कई सकारात्मक परिवर्तनों को भी अपना लिया है जो उनके जीवन जीने की शैली बनती जा रही है। यदि हम आगे भी इसी जीवनशैली का पालन करते रहे तो जीवन निश्चित रूप से अधिक अर्थपूर्ण होगा। यहां तक कि लॉकडाउन के नियमों का पालन करने के लिए एक नवीन जग-जागरण का उदय हुआ है। आज यह समझ में आया है कि हर समस्या का हल सरकार का उत्तरदायित्व नहीं है। कुछ समस्याओं से पार पाने के लिए एक-एक के योगदान का होना अनिवार्य है। ऐसा जन-जागरण न कभी देखा, न सुना जब संपूर्ण समाज स्वेच्छा से एक ध्येय को लेकर आगे बढ़े। कोरोना से इस जंग में हर व्यक्ति अपने आप में एक योद्धा है। सभी ने अपरिमित संयम, अनुशासन का परिचय दिया है।इतनी बड़ी आपदा ने हमें बहुत कुछ सिखाया है। कहां समय था कि हम नीले आकाश को निहारते, पास के गांव में मोर नाचता है, यह जान पाते। जन-जागरण हुआ अपनी आकांक्षाओं पर नियंत्रण पाने का, प्रदूषण के मूल कारण को पहचानने का। प्रकृति के साथ सीमा से अधिक खिलवाड़ हमारे विनाश का कारण बन सकता है। इस भयावह स्थिति से निकल सामान्य जीवन को पटरी पर लाने के लिए वर्तमान जन-जागरण की ऊर्जा व्यर्थ न जाए, यही संकल्प लिए सुंदर भविष्य की ओर अग्रसर हों।छाया श्रीवास्तव
  • उज्‍जवल भविष्य की कामनाबना रहे सामूहिकता का भाव शीर्षक लेख में डॉ. विजय अग्रवाल ने कोरोना वायरस तथा उसके प्रभाव स्वरूप उपजाई जा रही नकारात्मक स्थितियों का आकलन किया है। हमें यह समझना होगा कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज का अंत, उपन्यास का अंत, लेखक की मृत्यु, इतिहास का अंत अथवा ईश्वर की मृत्यु जैसी घोषणाएं निराशा से आक्रांत पाश्चात्य जगत में ही अधिक सामने आई हैं। भारतीय चिंतन तो सृष्टि के प्रत्येक जीव में सामूहिकता की भावना मानता है। सामूहिकता केवल एक भाव अथवा आवश्यकता ही नहीं है, यह एक सकारात्मक ऊर्जा है जिसके सहारे मानवता यहां तक पहुंची है। वैदिक चिंतन से अनुप्राणित भारत के प्रत्येक नागरिक के डीएनए में ही सामूहिकता है। यह जीवन की एक संरचना मात्र नहीं है, अपितु अपने आप में जीवन ही है। ऋग्वेद का अंतिम सूक्त सामूहिकता का आह्वान करता है-‘सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनासि जानताम्।’ कोरोना संकट स्थाई नहीं है। मानवता ने ऐसे अनेक संकट देखे हैं, उन पर विजय पाई है। गिरिधर के शब्दों में कहें तो-‘बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय’ से प्रेरणा लेकर सुखद एवं उज्‍जवल भविष्य की कामना करें।डॉ. वेदप्रकाश, हंसराज कॉलेज, दिल्लीदो गज दूरी जरूरीकोरोना से बचने के लिए मास्क लगाना और शारीरिक दूरी का पालन करना अनिवार्य है। लेकिन देखने में आ रहा है कि चाहे मदर डेरी का बूथ हो या किराना की दुकान लोग शारीरिक दूरी का पालन नहीं कर रहे हैं। जरूरत है कि दुकानों के सामने सफेद या पीले रंग के पेंट से गोले बनाए जाएं। ऐसा न करने वाले दुकानदारों के खिलाफ कार्रवाई हो। लोगों को खुद भी सोचना चाहिए कि अगर वे दूरी नहीं बनाएंगे तो अगर किसी को बीमारी हुई तो वे भी बीमारी के शिकार हो सकते हैं। अपना और दूसरे का बचाव दो गज दूरी में ही है। सुदीप साहू, नया विजय नगर गाजियाबाद जीवन की जरूरतकोरोना महामारी ने लोगों को एहसास करा दिया कि जीवन के पहिए को निरंतर चलाने के लिए सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान की मूलभूत आवश्यकता होती है। लोगों ने ख्वाहिशों को एक तरफ और जीवन को एक तरफ रखा है। भारत किसानों और गांव का देश है। इसके बावजूद हमारे यहां बहुत लोग कुपोषण और भुखमरी से दम तोड़ देते हैं। शायद महामारी से मरने वालों की संख्या इतनी नहीं होगी। जरूरत है जल्द से जल्द अर्थव्यवस्था के पहिए को चलाने की जिससे की लाखों लोगों को रोजगार मिल सके। अमन जायसवाल, दिल्ली विविबुद्ध के विचार पारलौकिकदैनिक जागरण के 7 मई के अंक में प्रकाशित अजरुन राम मेघवाल का लेख, बुद्ध के पास है विश्व कल्याण का मंत्र, पढ़ा। लेकिन बुद्ध के विचार पारलौकिक हैं। देखिए, बुद्ध की घोषणा ‘शस्त्र की विजय की अपेक्षा शांति और साधुत्व की विजय ही अधिक आनंद दायक है।’ लेकिन आज भारत के सामने कई जटिल समस्याएं हैं, आतंकवाद, नक्सलवाद के साथ ही पाकिस्तान व चीन जैसे देशों से भी कुछ न कुछ विवाद बना रहता है। ऐसे में सभी समस्या का निराकरण शांति से नहीं हो सकता है। 2ंल्लAी5ङ्गं्र2’ं0007¬ें्र’.ङ्घे
  • भारत को नीचा दिखाने वाला सर्वेक्षण
  • शनिवार, 9 मई, 2020: ज्येष्ठ कृष्ण 2 वि. 2077
  • क्या मैं अपनी तपिश और बढ़ाऊं तो राहत मिलेगी?
  • आर्थिक मुख्यधारा का हिस्सा बनें मजदूर
  • असफलता सफलता की ट्यूशन फीस है

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