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  • एलजी पॉलीमर्स पर 50 करोड़ का जुर्माना
  • शराब की ऑनलाइन बिक्री पर विचार करे सरकार: सुप्रीम कोर्ट
  • वैदिक मंत्रों से गूंजा व्हाइट हाउसवाशिंगटन: अमेरिका में राष्ट्रीय प्रार्थना दिवस पर व्हाइट हाउस के रोज गार्डन में हंिदूू पुरोहित ने पवित्र शांति का पाठ कराया। यह शांति पाठ कोरोना से प्रभावित व्यक्ति के स्वास्थ्य, सुरक्षा के लिए किया गया। ट्रंप के आमंत्रण पर न्यूजर्सी स्थित बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर के पुरोहित हरीश ब्रrाभट्ट प्रार्थना कराने के लिए पहुंचे थे। ’पेज 14।
  • छत्तीसगढ़ में मुठभेड़ में चार नक्सली ढेर एसआइ शहीद, 10 जवान लापता
  • कारखानों में रोज 12 घंटे से ज्यादा काम नहीं करेंगे कामगार
  • रिकवरी रेट और बढ़ा, केंद्र ने कहा-कोरोना संग जीना होगा
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  • कानपुर में दस व फतेहपुर में दो नए कोरोना संक्रमित मिले
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  • ट्रैक पर सोए 16 मजदूर महाराष्ट्र में ट्रेन से कटे
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  • सीबीएसई की लंबित परीक्षाएं एक जुलाई से
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  • कैलास मानसरोवर यात्र आसान, चीन सीमा तक सड़क तैयार
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  • इस गांव के खून से समृद्ध एम्स का ब्लडबैंकहिसार: दिल्ली की सीमा से सटा होलंबी कला गांव एम्स को पिछले 18 सालों से रक्तदान कर रहा है। जब भी किसी को जरूरत होती है एक अपील पर जुट जाते हैं गांव वाले। कोरोना के इस दौर में गांव वाले तीन बार कर चुके हैं रक्तदान।’पेज 12
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  • जागरण विशेषभले मर जाएं पर मुफ्तखोरी हमें मंजूर नहीं..
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  • चीन से गलती हुई या फिर वह अक्षम है: ट्रंप 14
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  • 15 सौ पीपीई सूट की खेप एचएलएल को भेजी
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  • एक जिला एक उत्पाद में युवाओं को मिलेंगे बंपर मौके
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  • सात हॉट स्पॉट बने ग्रीन, खुल गईं दुकानें
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  • सप्लाई चेन से पटरी पर आएंगे उद्योग
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  • कोरोना संक्रमित युवकों की रिपोर्ट निगेटिव
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  • पतंगबाजी ने गुल कर दी लकड़मंडी की बिजली
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  • गांवों को कर रहे कोरोना के खिलाफ जागरूक
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  • कांशीराम के चतुर्थ श्रेणी कर्मियों का हंगामा
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  • कोविड आइसीयू में तीन कोरोना संदिग्धों की मौत, 10 भर्ती
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  • आज खुलेगा ट्रांसपोर्ट नगर, सरपट दौड़ेगा कारोबार
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  • नवाबगंज में रैंडम सैंपलिंग कराई
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  • शनिवार, ज्येष्ठ मास, कृष्ण पक्ष, द्वितीया, वि.सं. 2077
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  • आंकड़ों की जुबानी
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  • हैलट के कोविड आइसीयू में डायलिसिस एवं ऑपरेशन संभव
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  • कोरोना से हो रहीं मौतें रोकने को लगाएं सीनियर फैकल्टी
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  • एचबीटीयू बनाएगा सस्ता पोर्टेबल वेंटीलेटर
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  • कृषि उत्पादों को ले जाने पर रोक नहीं
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  • तीन दिन बंद रहेगी रूमा की गंगागंज क्रॉसिंग
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  • वाहन की टक्कर से बाइक सवार की मौत
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  • निबंधन कार्यालय पहुंचने से पहले लेना होगा प्री अपाइंमेंट
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  • कपड़ा बाजार अभी फिलहाल नहीं खुलेगा
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  • सफाईकर्मी ने फांसी लगाकर दी थी जान
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  • कमिश्नर तक पहुंचा मामला तो वापस आई 225 फाइलें
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  • 20 घंटे तक पड़ी रही लाश, स्वास्थ्य विभाग की टीम भी नहीं पहुंची
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  • ट्रैक पर बढ़ाई गई पेट्रोलिंग सिग्नल पर भी हो रहा काम
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  • आरोग्य सेतु एप नहीं तो नहीं होगी रजिस्ट्री
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  • असोम की मॉडल से दुष्कर्म के प्रयास मामले में चार्जशीट
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  • भारी पड़ सकती है लापरवाहीमृतक कोरोना संक्रमित हुआ तो यह लापरवाही पुलिस समेत कई लोगों के लिए भारी पड़ सकती है। पोस्टमार्टम हाउस भेजने वाले पुलिसकर्मी, वहां तैनात कर्मचारी, वहां रोजाना आने वाली भीड़ संक्रमित हो सकती है।
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  • जब्बा पढ़ाई का..
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  • उद्यमी कर्मचारियों का बीमा और कोरोना संबंधी जांच जरूर कराएं
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  • मानवता के वारिस की राह तकती रही लावारिस लाश
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  • दिल्ली की तर्ज पर कानपुर में भी खोलें बाजार : ज्ञानेश
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  • मंडलायुक्त को ज्ञापन देते अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के पदाधिकारी ’ जागरण
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  • छत से गिरे शटरिंग कारोबारी की मौत
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  • दो खातों में गई पार्षदों से हड़पी गई रकम
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  • प्रतिबंध के बाद भी बेची 3843 पेटी देशी शराब
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  • 7 साल से कम की उम्र मे रखा रोजा
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  • ईद के लिए रखे पैसों से भूखों को खिलाएं खाना
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  • लॉकडाउन में कटी जेब, सूरत से आठ-आठ सौ रुपये देकर आए यात्री
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  • मालदार किशमिश व खजूर से अदा करें सदका ए फित्र
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  • अभियंता हो रहे बीमार एडीएम से जांच की मांग
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  • सैकड़ों क्विंटल गेहूं दे चुके किसान पाई-पाई को तरसे
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  • गर्भवती महिलाओं की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाएगा पुष्टाहार
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  • व्यापारियों ने एसएसपी को सौंपी पीपीई किट
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  • जीडी गोयनका में ऑनलाइन एक्टिविटी क्लासेस शुरू
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  • छह जुलाई से सीएसजेएमयू का नया शैक्षिक सत्र होगा शुरू
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  • इस तरह भेजिए अपनी तस्वीरवीथिका के युवा पाठकों (12वीं तक के बच्चों) ने अपने हुनर से इसे नई जीवंतता प्रदान की है। रोज चार सौ से ज्यादा कविताएं, कहानियां और पेंटिग आदि मेल पर आ रही हैं। आप भी अपनी कृति के साथ तस्वीर (नीचे की तरह) खिंचवाकर हमें ाउ पर ई-मेल कर सकते हैं। मेल के सब्जेक्ट में वीथिका लिखकर अपना नाम, पता, कक्षा और फोन नंबर लिखना न भूलिएगा।
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  • उपेक्षा का दुष्परिणाममहाराष्ट्र के औरंगाबाद में पैदल अपने घर जाने को निकले मजदूरों की मालगाड़ी से कुचल कर मौत मन-मस्तिष्क को झकझोर देने वाला हादसा है। यह हादसा केवल इसलिए नहीं हुआ कि थके-हारे मजदूरों ने रेल पटरियों पर सोने की गलती की, बल्कि इसलिए भी हुआ कि कोई यह देखने-सुनने वाला नहीं था कि आखिर वे पैदल सफर करने को क्यों मजबूर हुए? किसी को उन्हें पैदल जाते देखकर रोकना चाहिए था, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। यह संभव नहीं कि महाराष्ट्र के शासन-प्रशासन के लोगों ने इन अभागे मजदूरों को पैदल जाते देखा न हो। साधनहीन मजदूरों की दीन दशा देखकर भी उनकी अनदेखी करना संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। उन कारणों की तह तक जाने की जरूरत है जिनके चलते श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाए जाने की घोषणा के बाद भी मजदूर पैदल ही अपने गांव-घर के लिए निकल ले रहे हैं। समस्या केवल यह नहीं है कि महाराष्ट्र के विभिन्न शहरों में रह रहे मजदूर ही पैदल अपने गावों के लिए कूच कर रहे हैं, बल्कि यह भी है कि अन्य राज्यों में रह रहे कामगार भी ऐसा करने को मजबूर हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि मजदूरों को उनके गांव पहुंचाने की जो व्यवस्था की गई है उसमें कोई खोट है? आखिर क्या कारण है कि आए दिन ऐसे समाचार आ रहे हैं कि प्रमुख औद्योगिक शहरों में रह रहे मजदूर अपने गांव जाने की मांग को लेकर सड़कों पर निकल आ रहे हैं? इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि कुछ राज्य बाहरी मजदूरों से रुकने का आग्रह कर रहे हैं। उन्हें यह समझना होगा कि इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि उनके खाने-रहने की उचित व्यवस्था की जाए। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि अनेक स्थानों पर यह व्यवस्था संतोषजनक नहीं। यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि जिन भी राज्यों से मजदूर पैदल अपने गांव जाने के लिए निकल ले रहे हैं उन्हें जवाबदेह बनाया जाए। आखिर जब देश के कई हिस्सों से ऐसे समाचार आ रहे हैं कि मजदूर कोई साधन-सवारी न मिलने पर पैदल ही रास्ता नाप रहे हैं तब फिर संबंधित राज्य सरकारों को अपने जिला प्रशासन को ऐसे आदेश-निर्देश जारी करने में क्या कठिनाई है कि वे जहां भी पैदल जाते दिखें उन्हें रोककर उचित तरीके से उनके शहर भिजवाने की व्यवस्था की जाए? यह सही है कि अनिश्चित भविष्य को देखते हुए मजदूर अपने गांव-घर जाने को लेकर बेचैन हो रहे हैं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस बेचैनी की एक वजह उनकी उपेक्षा भी है। यह उपेक्षा यही बताती है कि राज्य सरकारें अपने वायदे पर खरी नहीं उतर पा रही हैं।
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  • धैर्य खो रहा विपक्षमुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नेता प्रतिपक्ष राम गो¨वद चौधरी को पत्र लिखकर सही नसीहत दी है कि यदि वह कोरोना नियंत्रण मुहिम में जुटे तंत्र का मनोबल नहीं बढ़ा सकते तो कम से कम निर्थक आरोप लगाकर मनोबल गिराना तो नहीं चाहिए। आसार कम ही हैं कि चौधरी और अन्य विपक्षी नेता इस नसीहत का ध्यान रखेंगे, पर विपक्ष को याद रखना चाहिए कि कोरोना संकट वैश्विक आपदा है। इसके लिए किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, पर जहां तक इस आपदा से निपटने का सवाल है, योगी आदित्यनाथ के विजन, प्रबंधन और क्रियान्वयन की सराहना पूरी दुनिया में की जा रही है। उत्तर प्रदेश का भौगालिक और जनसांख्यिक विस्तार अधिकतर देशों से अधिक है। इतने बड़े भूभाग और जनसंख्या को कोरोना संकट से यथासंभव महफूज रखने का प्रबंधन आसान नहीं है। योगी सरकार ने बहुत व्यवस्थित तरीके से इसे करके दिखाया। मुख्यमंत्री की शायद यही उपलब्धि विपक्ष को बेचैन कर रही है। विपक्षी दल जिस तरह कभी श्रमिकों, तो कभी कोई अन्य सवाल उठाकर सरकार को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं, उसे आम आदमी भी पसंद नहीं कर रहा होगा। वजह है कि केारोनाकाल में सरकार ने न सिर्फ अन्य राज्यों में फंसे छात्रों और श्रमिकों को उनके घर पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाई बल्कि लाखों परिवारों को खाना, राशन और पैसा भी पहुंचाया। बेशक इतने बड़े अभियान में कुछ गड़बड़ियां रह गई होंगी, कुछ लोग सहायता पाने से वंचित रह गए होंगे, पर ऐसी छोटी बातों को तूल देकर सरकार की पूरी कवायद को खारिज कर देना उचित नहीं है। कोरोना राजनीति नहीं बल्कि योगदान करने का विषय है। विपक्षी दलों को अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए कि जिस अभियान में सरकार के अलावा छोटे-बड़े उद्यमी, व्यवसायी, दुकानदार, गरीब किसान, मजदूर, बच्चे, शिक्षक, डॉक्टर, पुलिसकर्मी, सफाईकर्मी और अन्य सामाजिक वर्गो के लोग अपनी स्थिति के हिसाब से योगदान कर रहे हैं, उसमें उन्होंने क्या योगदान किया? कोरोना संकट से घिरे लोगों से यह बात छिपी नहीं है कि कौन उनकी मदद कर रहा और कौन राजनीति। मौका मिलने पर लोग जवाब भी देंगे।
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  • गिनती बढ़ती जा रही दिखे न कोई राह,देखि मौत के आंकड़े मुंह से निकले आह! मुंह से निकले आह नहीं कुछ भी कहि जाए, यह संकट का दौर हमें भगवान बचाए।रहें घरों में लोग यही है सबसे विनती,वरना मुश्किल और होयगी करना गिनती।- ओमप्रकाश तिवारी
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  • जन-जागरणप्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में मनुष्य अपने को सर्वज्ञानी, सर्वश्रेष्ठ, अपराजित मानने का भ्रम पालने लगता है। जल, वायु, पृथ्वी, आकाश एवं अग्नि को भी अपने निहित स्वार्थ के लिए नहीं छोड़ता। अपनी-अपनी इच्छाओं एवं सामथ्र्य के अनुरूप प्रगति के अंतहीन अंत की ओर निरंतर अग्रसर होने की होड़ में लगा रहता है, परंतु मानव की सब कुछ पा लेने की भूख कभी-कभी किस प्रकार धराशायी होने लगती है, यह हमने आज जाना है।संसार में प्रलय आने में देर नहीं लगती। वह कोरोना के रूप में हो या विश्व युद्ध। हालांकि यह भी सच है कि आज इस वैश्विक मार को सहते हुए इंसानों ने कई सकारात्मक परिवर्तनों को भी अपना लिया है जो उनके जीवन जीने की शैली बनती जा रही है। यदि हम आगे भी इसी जीवनशैली का पालन करते रहे तो जीवन निश्चित रूप से अधिक अर्थपूर्ण होगा। यहां तक कि लॉकडाउन के नियमों का पालन करने के लिए एक नवीन जग-जागरण का उदय हुआ है। आज यह समझ में आया है कि हर समस्या का हल सरकार का उत्तरदायित्व नहीं है। कुछ समस्याओं से पार पाने के लिए एक-एक के योगदान का होना अनिवार्य है। ऐसा जन-जागरण न कभी देखा, न सुना जब संपूर्ण समाज स्वेच्छा से एक ध्येय को लेकर आगे बढ़े। कोरोना से इस जंग में हर व्यक्ति अपने आप में एक योद्धा है। सभी ने अपरिमित संयम, अनुशासन का परिचय दिया है।इतनी बड़ी आपदा ने हमें बहुत कुछ सिखाया है। कहां समय था कि हम नीले आकाश को निहारते, पास के गांव में मोर नाचता है, यह जान पाते। जन-जागरण हुआ अपनी आकांक्षाओं पर नियंत्रण पाने का, प्रदूषण के मूल कारण को पहचानने का। प्रकृति के साथ सीमा से अधिक खिलवाड़ हमारे विनाश का कारण बन सकता है। इस भयावह स्थिति से निकल सामान्य जीवन को पटरी पर लाने के लिए वर्तमान जन-जागरण की ऊर्जा व्यर्थ न जाए, यही संकल्प लिए सुंदर भविष्य की ओर अग्रसर हों।छाया श्रीवास्तव
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  • शनिवार, 9 मई, 2020: ज्येष्ठ कृष्ण 2 वि. 2077
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  • उज्‍जवल भविष्य की कामनाबना रहे सामूहिकता का भाव शीर्षक लेख में डॉ. विजय अग्रवाल ने कोरोना वायरस तथा उसके प्रभाव स्वरूप उपजाई जा रही नकारात्मक स्थितियों का आकलन किया है। हमें यह समझना होगा कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज का अंत, उपन्यास का अंत, लेखक की मृत्यु, इतिहास का अंत अथवा ईश्वर की मृत्यु जैसी घोषणाएं निराशा से आक्रांत पाश्चात्य जगत में ही अधिक सामने आई हैं। भारतीय चिंतन तो सृष्टि के प्रत्येक जीव में सामूहिकता की भावना मानता है। सामूहिकता केवल एक भाव अथवा आवश्यकता ही नहीं है, यह एक सकारात्मक ऊर्जा है जिसके सहारे मानवता यहां तक पहुंची है। वैदिक चिंतन से अनुप्राणित भारत के प्रत्येक नागरिक के डीएनए में ही सामूहिकता है। यह जीवन की एक संरचना मात्र नहीं है, अपितु अपने आप में जीवन ही है। ऋग्वेद का अंतिम सूक्त सामूहिकता का आह्वान करता है-‘सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनासि जानताम्।’ कोरोना संकट स्थाई नहीं है। मानवता ने ऐसे अनेक संकट देखे हैं, उन पर विजय पाई है। गिरिधर के शब्दों में कहें तो-‘बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय’ से प्रेरणा लेकर सुखद एवं उच्च्वल भविष्य की कामना करें।डॉ. वेदप्रकाश, हंसराज कॉलेज, दिल्लीसंकट में बरतें संयम व सावधानी>>कोरोना वायरस ने पूरे विश्व के शक्तिशाली देशों को घुटनों पर लाकर रख दिया है। सारे देश मिलकर कोरोना वायरस से मुक्ति पाने में जुटी है और डॉक्टर्स, नर्सेज एकजुट होकर लड़ रहे है। उनकी जितनी भी सराहना की जाए कम होगी। नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस से लड़ने के लिए कठोर कदम उठाये है जो हमारे देश की भलाई के लिए है और हम सभी को एक भारतीय होने के नाते उनका साथ देना चाहिए ताकि हम देश को रोगमुक्त कर सके। कोरोना वायरस के खिलाफ यह महायुद्ध तब तक जारी रहेगा, जब तक हम इस वायरस को जड़ से खत्म न कर दें। प्रधानमंत्री द्वारा औद्योगिक विकास एवं विदेशी निवेश के लिए उचित समय पर फैसला लेना एक सराहनीय एवं सकारात्मक कदम है। इस संकट में वायरस एवं अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए संयम बरतना होगा। मोहित यादव, फरुखाबादबंद होनी चाहिए शराबकोरोना महामारी से आज आम जनता वैसे ही बहुत परेशान है। ऐसे में शराब की दुकानों को खोल देने के आदेश से आम जनजीवन बहुत बुरे तरीके से प्रभावित होने की आशंका है। कमाई है नहीं, इस पर शराब का खर्चा कहीं एक और घरेलू हिंसा का कारण न बन जाये। शराब खरीदने के चक्कर मे लॉकडाउन का उल्लंघन भी धड़ल्ले से होगा, क्योंकि शराब की दुकानें दिनभर खुलेंगी। सड़कों पर दिनभर आवाजाही बनी रहेगी, कैसे रुकेंगे ये लोग! आज सब लोग मिलकर इस कोरोना से जंग लड़ रहे हैं, शहर के हालत वैसे भी ठीक नहीं है। ऐसे में शराब की दुकानों को खोल देने से महामारी की ये लड़ाई भी कमजोर हो जाएगी, इसके दूरगामी परिणाम बहुत खतरनाक साबित हो सकते हैं। इसका नजारा पहले दिन खोले गए शराब के ठेकों में दिखाई दिया। शराब की दुकानों को खोलने का आदेश वापस लिया जाना चाहिए। प्रदीप निगम, कानपुर
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  • भारत को नीचा दिखाने वाला सर्वेक्षण
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  • क्या मैं अपनी तपिश और बढ़ाऊं तो राहत मिलेगी?
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  • आर्थिक मुख्यधारा का हिस्सा बनें मजदूर
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  • असफलता सफलता की ट्यूशन फीस है
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