कुछ कहती हैं कुर्सियां..

  • January 13, 2019

राज्य ब्यूरो, लखनऊ : राजनीति में अगर नेताओं का कद बोलता है तो कुर्सियों की ऊंचाई के भी अपने मायने होते हैं। सपा-बसपा की प्रेसवार्ता में नेताओं और कुर्सियों के कद का यह फर्क मुखर होकर सामने आया। हालांकि, मायावती और अखिलेश संतुलन साधते हुए एक-दूसरे के बराबर दिखने का प्रयास करते रहे लेकिन, अखिलेश से बड़ी माया की कुर्सी, सपा से बड़े बसपा के झंडे और पोस्टरों में दिखने वाली बसपा की बढ़त ने बता दिया कि मायावती बड़ी लकीर खींच गई हैं।

प्रेसवार्ता शुरू होने से पहले पत्रकारों की नजर जैसे ही मायावती और अखिलेश के लिए रखी कुर्सियों पर पड़ी तो सुगबुगाहट शुरू हो गई। मायावती के लिए रखी कुर्सी, अखिलेश की कुर्सी से बड़ी थी। इस पर कई लोगों ने चुटकी ली कि कुर्सियों का साइज शायद राजनीतिक कद और अनुभव के आधार पर तय किया गया है। नजर कुर्सियों से ऊपर उठी तो पीछे दीवार पर लगे सपा-बसपा के झंडों में भी आकार का वही अनुपात नजर आया। बसपा का झंडा बड़ा और सपा का छोटा था। खास बात यह कि जैसे इन झंडों में चुनाव चिह्न् के तौर पर बने हाथी व साइकिल अलग-अलग दिशा में जाते दिख रहे थे, वैसे ही कुर्सियों के पीछे लगी फोटो में भी अखिलेश और मायावती एक-दूसरे से विपरीत देख रहे थे।

प्रेसवार्ता शुरू होने पर मायावती जब अखिलेश के साथ एक मेज पर आईं तो ढाई दशक पहले हुए ऐसे ही तालमेल और गेस्ट हाउस कांड के तौर पर उसके अप्रिय समापन का जिक्र करना नहीं भूलीं। एक बार नहीं, उन्होंने तीन बार इस घटना का नाम लिया। मायावती के स्मृति पटल पर तो वह हादसा अमिट है लेकिन, इधर ढाई दशक में एक पीढ़ी आगे बढ़ चुके सपा नेतृत्व के लिए यह बातें असहज करने वाली थीं। यह मायावती की मानसिक बढ़त थी तो इसी वजह से अखिलेश बैकफुट पर आते दिखे। यही वजह रही कि मायावती के बाद जब अखिलेश के संबोधन का नंबर आया तो उन्होंने खास तौर पर अपने कार्यकर्ताओं को संदेश दिया कि मायावती का सम्मान मेरा सम्मान और उनका अपमान मेरा अपमान है।

लखनऊ में सपा व बसपा के गठबंधन की औपचारिक घोषणा के दौरान सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव व बसपा प्रमुख मायावती की कुर्सियां ’ जागरण

’>>अखिलेश से बड़ी कुर्सी, सपा से बड़ा झंडा और पोस्टरों से निकले संकेत

याद आए ‘यूपी के लड़के’

गठबंधन की प्रेसवार्ता के दौरान लोगों को दो साल पहले उसी होटल के उसी हॉल में हुई ‘यूपी के दो लड़कों’ की प्रेसवार्ता याद आ गई। लोग इस पर भी चुटकी लेते रहे कि दो साल पहले दोस्ती के तराने वाले दो लड़कों में से अब सामने मौजूद एक लड़का दोस्ती की बात करना तो दूर, दोस्त का नाम लेने तक को तैयार नहीं है।

कुछ कहती हैं कुर्सियां..